नंद बाबाजी ने अपना पूरा जीवन ब्रह्मांडीय और दैविये घटनाओं को समझने में बिताया । वो देवी माँ के बहुत बड़े भक्त थे, दुर्गा सप्तसती का पाठ किये बगैर कभी भी एक अन्न का दाना नहीं ग्रहण करते थे । आज भी लोगों को दुर्गा सप्तसती का पूरा पाठ करने में करीब 5 से 6 घंटे लग जाते है, पर वो दुर्गा सप्तसती का पूरा पाठ प्रति दिन एक से डेढ़ घंटे में समाप्त कर देते थे । उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों को सही मार्गदर्शन दिखाने में समर्पित कर दिया । अपनी भविष्यवाणी और भक्ति बल से उन्होंने न जाने कितने परिवारों को अनेक कष्टों से मुक्ति दिलाई है।
नंद बाबाजी एक विनम्र तथा सरल व्यक्ति थे, लेकिन वे अदम्य ऊर्जा, साहस और दृढ़ विश्वास वाले व्यक्ति थे । उन्होंने सत्तर वर्षों से भी अधिक समय तक अकेले ही दुर्जनों के आक्रमणों और अपने ऊपर बुरी शक्तियों के हमलों का सामना किया । नन्द बाबाजी ने लोगों के मन से नकारात्मकता को निकाल कर अथक प्रयास द्वारा उनमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर तथा उनको भक्ति के मार्ग पर चलने को प्रेरित किया । लोगों ने भी अथाह प्रेम और विश्वास के साथ उनको अपने जीवन में एक गुरु की तरह स्थान दिया तथा हमेशा उनके बताए रास्तों पर चल कर अपने जीवन को सुरक्षित किया ।
बाबाजी ने हमेशा अपने अनुयायिओं को सर्वप्रथम महत्व दिया, तथा उनके कष्टों में हमेशा उनके साथ खड़े पाये गएँ । नन्द बाबाजी की एक सवारी थी उनकी सफ़ेद रंग की घोड़ी, जो हमेशा उनके साथ रहती थी । कहते हैं की जब भी किसी शिष्य को कोई परेशानी होती तो वह बाबाजी से मन ही मन कष्ट दूर करने की विनती करता तो इधर पता नहीं घोड़ी को कैसे पता लग जाता था और वो जोर - जोर से हिनहिनाने लगती था । बाबाजी जब अपने घोड़ी को इस तरह हिनहिनाते देखते तो उन्हें पता चल जाता था की उनका कोई शिष्य कष्ट में है, और बगैर देर किये उसी समय अपने कपड़े बदल कर अपनी घोड़ी पर बैठ जाते थे, घोड़ी लम्बी दुरी तय करके उसी घर के सामने रूकती थी जहाँ से उन्हें याद किया गया होता है । आज बाबाजी इस मृत्युलोक से निकल कर पितृलोक में वास करते है तथा उनकी घोड़ी भी वही कही होगी, पर आज भी यहाँ लोग नन्द बाबाजी और उनकी घोड़ी के बारे में अनेक प्रचलित कथाएँ सुनते और सुनाते रहते हैं ।
नन्द बाबाजी का जन्म पटना जिले के दानापुर प्रखंड में नौबतपुर थाने के एक गांव में हुआ था जिस गांव का नाम "परसा" है । उनके बचपन में ही उनके पिता श्री रामवरण उपाध्याय जी ने उनका दाखिला गया के खरखुरा में एक संस्कृत विद्यालय में करवा दी थी । बाबाजी पढ़ने में हमेशा अव्वल आया करते थे । वो बचपन से ही संस्कृत के शब्दों के साथ खेलते हुए बड़े हुए थे । बाबाजी अब करीब ग्यारह साल के हो चुके थे । इस उम्र में बच्चे आज कल पढ़ना और समझना शुरू करते थे, पर बाबाजी तो जैसे नियति के द्वारा भेजा हुआ वो आत्मा थे जो उम्र की सीमा से बाहर निकल कर ग्यारह साल के उम्र से ही कर्म कांड के सारी विधिया जानकार लोगों के यहाँ पूजा करवाने लगे थे । वहां से ही उनके यजमान बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी । बाबाजी में एक बहुत ही गजब की विशेषता थी की वो किसी भी पुस्तक को बहुत जल्दी कंठस्त कर उसे आत्मसात कर लेते थे । गीता, भागवत, रामायण, शिव पुराण, दुर्गा सप्तशती, अठारह पुराण, बहुत से उपनिषद आदि सब उन्होंने कंठस्त कर लिया था । जब भी उन्हें कोई पूजा करनी होती थी या कोई भगवन कथा करनी होती थी तो वे कंठस्त ज्ञान से ही पूजा करते थे या कथा करते थे बस पुस्तक का पन्ना सिर्फ औपचारिता के लिए पलटते थे ।
इस तरह अपनी अनेक खूबियों के साथ न जाने अपने शिष्यों को कितने लीलाएं दिखाते हुए बाबाजी का दिन बीत रहे थे, उनमें से अनेक ऐसी लीलाएँ थी की शायद कोई कोई जीवन भर भी भूल न पाये । ऐसी एक लीला बाबाजी का मैं यहाँ बताता हूँ, क्युकी सारी लीलाओं का जिक्र करना तो लगभग असंभव है ।
एक बार की बात है की बाबाजी अपने भक्त शिष्य के यहाँ किसी गाँव में गए हुए थे तथा वहां बहुत से शिष्यगण उनके अगल - बगल में बैठ कर उनसे ज्ञान की बातें सुन रहे थे । सुबह - सुबह का समय था बाबा को अपने लिए भोजन बनाने का समय हो चला था, ( यहाँ जानने वाली बात यह है की बाबाजी किसी के घर उनके यहाँ बना भोजन ग्रहण नहीं करते थे, बल्कि वो अपना भोजन खुद बनाते थे । हां, शिष्यगण चावल, आटा या कच्चे सब्जिओं का प्रबंध अवश्य कर दिया करते थे ) । बाबाजी खाना बनाने के लिए अपना व्यवस्था कर ही रहे थे की कोई गाँव की ही एक स्त्री ने उन्हें गाय का दूध लाकर दिया की " महाराज जी आज आप इस दूध का भी सेवन कीजियेगा " ( शिष्य लोग बाबाजी को महाराज जी ही कहकर बुलाया करते थे ) । बाबाजी के लिए ये सामान्य सी बात थी कि कोई भी उन्हें कुछ भी भेंट कर के जाता था, इसलिए बाबाजी इस बात पर कोई प्रक्रिया न कर उस दूध को सहर्ष स्वीकार कर लिया । पर वहां बैठे लोगों ने उस स्त्री के वहां से जाने के बाद बाबाजी को बताया कि आप इस दूध को न पिए । बाबाजी ने चौंक कर उनसे पूछ "क्यों" । तब लोगों ने बताया कि ये स्त्री एक तांत्रिक डायन है जिसका स्वभाव ही लोगों को तकलीफ देना है इसलिए महाराज जी आप से हम सब प्रार्थना करते हैं की आप ये दूध न पियें । बाबाजी ने उनसे थोड़ा मुस्कुरा कर पूछा की " तो उसको मुझसे क्या दुश्मनी है की, वो मेरा अहित करना चाहेगी " । पर लोगों ने जिद पकड़ ली की महाराज जी कुछ भी हो जाये आप ये दूध नहीं पीएंगे ।
बाबाजी को भी अब कुछ आशंका होने लगी कि हो न हो कुछ तो बात है जो ये लोग इतना विरोध कर रहें है इस दूध को पीने को लेकर, इसलिए बाबाजी ने उनलोगों को बोला की अगर तुम लोगों की बातों में दम है तो मै इस बात की जांच अभी कर लेता हूँ । वहां बैठे लोग भी उत्सुकता भरी नजरों से बाबा को देखा की, बाबाजी क्या करने वाले है । बाबाजी ने किसी एक को बोला कि उन्हें थोड़ा धान का लावा लाकर दे तथा वो खुद आग जलाकर उस स्त्री द्वारा दिया हुआ दूध आग पर चढ़ा दिए । कुछ देर बाद धान का लावा भी उनके पास आ चूका था । बाबाजी अब दूध को उबलने का इंतज़ार कर रहे थे, उन्होंने लोगों को बोला की दरवाजा खोलकर सब अगल - बगल हो जाये । थोड़ा वक़्त बीतने के बाद दूध उबलने लगा, जब जब दूध उबलता तब बाबाजी कुछ मंत्र पढ़कर लावा के कुछ दाने दूध में डालते जा रहे थे । कुछ देर तक लोग सांस रोके बाबाजी को ये सब करते हुए देख रहे थे, तभी बाहर से किसी स्त्री की दिल दहला देने वाली चीखें लोगों के कानों में आने लगी । पहले धीरे-धीरे तथा बाद में तेज होती जा रही थी, जैसे कोई स्त्री चीखते हुए इधर ही दौड़ती आ रही हो । कुछ ही देर बाद वो स्त्री जो बाबा जी को दूध दे कर गई थी, निवस्त्र गिरती - पड़ती हुई खुला हुआ दरवाजे के चौखट के बीचों बीच आकर गिर गयी तथा दोनों हाथ जोड़कर बाबाजी से गिडगिराने लगी की " महाराज जी मुझे माफ़ कर दीजिये " । बाबाजी ने बोला " क्यों ! मुझसे क्यों माफी मांग रही हो, मैंने तो तुम्हारा दिया हुआ दूध भी पी लिया " । तब उस स्त्री ने बोला कि " नहीं महाराज जी अगर आप वो दूध पी लिया होता तो आप अभी जीवित ही नहीं होते " ।
तब बाबाजी जी ने उस स्त्री से डपटकर पूछा की आखिर तू मुझे मरना क्यों चाहती हो, तब उस स्त्री ने बताया कि वह एक तांत्रिक डायन है और वह लोगो को पूजा और अन्य मामलो में डरा धमका कर अपने जीवन के सुख सुविधा के लिए पैसे ऐठि करती थी । पर जब से आप इस गाँव में कदम रखा है तब से लोग डरना तथा मेरे पास आना छोड़ दिया है जिससे मुझे पैसे आदि की तंगी होने लगी है, इसलिए मैं आपको अपने रास्ते से हटाना चाहती थी । पर उस स्त्री को शायद ये पता नहीं था की बाबाजी के पास भी आध्यात्मिक शक्ति है, अब वो बाबाजी से माफ़ी मांग रही थी, क्यूंकि उसके पूरे शरीर में अग्नि के ताप जैसी गर्मी हो रही थी जैसे की वो किसी भट्ठी में खड़ी हो । बाबाजी ने किसी को इशारा किया कि उस स्त्री के निःवस्त्र शरीर पर कपडा डाल दे, फिर उस स्त्री से बोला कि आज के बाद तू इस गाँव में नहीं रहेगी तथा हमेशा के लिए ये गाँव छोड़कर चली जाएगी । उस स्त्री ने बाबाजी की सारी शर्तें मान ली, तब बाबाजी ने आग पर चढ़ा हुआ दूध में पानी का छींटा मारा और दूध को ठंडा किया । अब वह स्त्री सामान्य हो गई तथा बाबाजी को प्रणाम कर वह गाँव से हमेशा के लिए चली गयी ।
कुछ समय बीतने के बाद गाँव में एक बात का खुलासा और हुआ कि जब बाबाजी उस स्त्री को दंड दे रहे तो उस गाँव में उसी समय एक गाय का पेट असामान्य रूप से फैलते जा रहा था, लगता था कि गाय का पेट अभी फट जाएगा । पर जब बाबाजी ने दूध में पानी का छींटा मारा तो वह स्त्री के साथ वो गाय भी सामान्य हुआ था । फिर जब लोगों को ये पता चला की वो दूध जो वह स्त्री बाबाजी के लिए लाई थी, वह उसी गाय का था तब सब कुछ उन्हें समझ में आ गया ।
नन्द बाबा जी अपने पुरे जीवन भर लोगों को कष्टों से निकाल कर सही मार्ग पर लाने का प्रयत्न किया, पर 17 मई 1974 दिन शुक्रवार को नौबतपुर के एक अस्पताल में बाबा ने बुढ़ापे में होने वाली सामान्य बीमारियों की लम्बी इलाज के बाद अपना शरीर त्याग कर पितृ लोक चले गएँ । पर वहीँ उनके यहाँ उनके पोते के रूप में एक बालक का जन्म हुआ जिसके लिए बोला जाता है की वो बाबा बैद्यनाथ धाम के शिव का आशीर्वाद है, जिसे उसके माता-पिता ने भोले बाबा से मन्नतें कर - कर के पाया है । उस बालक का जन्म 31 दिसंबर 1978 को उसी अस्पताल में हुआ जहाँ बाबा जी ने अपना शरीर त्यागा था । घर ब्राह्मण का होने के कारण जन्म के समय तुरंत कुंडली देखा गया और जन्माक्षर भी "भो" अक्षर से शिव का नाम भोला रखा गया । माता-पिता की पहली संतान होने के कारण उस बालक की परवरिश बड़े प्यार से हुई । जीवन की गाडी बड़े मजे से निर्विरोध चलती जा रही थी, पर कुछ ही समय बाद उस बालक के जीवन में दुखों की बारिश होने लगी जिसका वर्णन मैं यहाँ नहीं कर सकता, पर अब उसके जीवन में उदासी सी आने लगी । शायद उस बालक को जीवन की हर कष्टों को बड़े नजदीक से देखना था इसलिए भगवान शिव ने उसे जीवन की हर सच्चाई से आंखें मिलाना सीख रहे थे ।
अब वो बालक अपनी पढाई के साथ -साथ बड़ा हो रहा था तथा जीवन के बारे में भी उसकी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी । अपने पिता के नौकरी की वजह से बालक को अपने जन्मस्थल से थोड़ी दूर पटना में ही रहना पड़ा । उसकी पूरी पढाई-लिखाई तथा बचपन के जीवन पटना में ही बीत रही थी । एक वक़्त ऐसा भी आ गया की वो बालक पटना के बांस घाट वाली शमशान में गंगा नदी पर जाकर घंटों वहां बैठा करता था, तथा जलते हुए लाशों को बड़ी उत्सुकतावश देखा करता था । उसके अंदर हमेशा सवालों के बवण्डर चलते रहते थे । इंसान बिना सहारे के चलता कैसे है, वो अपने आप जिन्दा कैसे रहता है, सारे इंसान एक जैसे क्यों नहीं है, सबके काम अलग अलग क्यों है, जब इंसान मरता है तो क्या कभी वापिस नहीं आएगा?, क्या अच्छे कर्म या बुरे कर्म का कोई हिसाब नहीं होता है ?, मरने के बाद जब शरीर जल जाता है तो क्या सब कर्म ख़त्म हो जाते है? । ऐसे न जाने कितने सवाल अपने अंदर से तुफान के जैसे निकलता देख कर वो बेचैन रहने लगा । उस बेचैनी को रोकने के लिए उसने पटना के हर मंदिर के भगवान् या उस मंदिर के पुजारी के सानिध्य में आने जाने लगा । अपने अंदर के सवालों का जवाब पूछता पर जो जवाब मिलता था वो सम्पूर्ण नहीं होता, इसलिए असंतुष्टि बनी रहती थी ।
इस तरह जवाब की तलाश में वो पढाई के आलावा जो भी वक़्त मिलता, इधर उधर की जो भी आध्यात्मिक किताबें मिलती उसे पढता । अब वो किताबें एक पेज का हो या सौ पेज का, इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता यहां तक की किताबों के नाम क्या है, किसने लिखी है उसे कोई परवाह नहीं था । उन्हीं दिनों उसके हाथ कुछ ध्यान और योग से संबंधित किताबें हाथ लगी, तो उन्हें पढ़कर धीरे-धीरे वो ध्यान के तरफ आकर्षित होने लगा, ध्यान करने की जब प्रक्रिया शुरू हुई तो आधी- आधी रात को जब की सब घरवाले सो जाते तो अँधेरे में ही वो ध्यान करने बैठ जाता था । बहुत समय तक वो ध्यान में ही बैठा रहता फिर उसे नींद आने लगती तो बिस्तर पर जाकर सो जाता । इस तरह बहुत से महिने गुजर गया और वो ध्यान लगाने में भी माहिर हो गया था, अब तो जब भी वो ध्यान पर बैठता तो उसके सर के ऊपर सहस्रार चक्र खुल कर ब्रह्मांडीय उर्जा से जुड़ जाती थी और उसके सर के बालों में कम्पन होने लगते । अब ध्यान में उसे बहुत से जवाब मिलने लगे थे अपने आप, पर ये ध्यान उसे लोगों से दूर करने लगा था ।
वह बालक अब बड़ा हो चूका था और लोगों के दुःख देख कर उसे अपने दुःख का अहसास होता था, वह लोगों के दर्द को जैसे महसूस करने लगा था । ध्यान से उसे शान्ति तो मिली, पर बहुत से उतर अभी भी नहीं मिला था । इसी बीच उसे मुंबई जाने का मौका मिला जहाँ शायद उसे आखरी सबक सीखना था, वहां उसने जैसे जीवन और मौत दोनों को करीब से देखा था । उसे जीवन के कुछ ऐसे पहलु से भेंट हुई, जहां से उसे मोह और माया का झूठा चेहरा दिखा । जीवन में उसे दुःख तो बहुत हुआ पर कहा जाता है की दुःख में ही इंसान सबक सीखता है, और यही से जीवन के कर्मों के बारे में उसे समझ आने लगी । वापिस पटना लौटने के बाद जीवन आगे सामान्य रूप से बढ़ रही थी, पर कर्मों को समझने की उतेजना अभी भी उतनी ही प्रबल थी । इसी उधेड़ बुन की जिंदगी में उसे फिर से अपने घर जहां बाबा जी रहते थे वही जाना का मौका मिला । वहीँ बाबा जी के द्वारा कुछ नोट्स या उनकी कृतियाँ लिखीं गयीं थी, वो उसके हाथ लगी । वो जब उन कृतियों को पलट कर देख रहा था तभी एक नोट्स पर उसकी निगाहें रुक गयी, जब उसने उसे गौर से देखा तो बाबा जी के द्वारा लिखा हुआ ज्योतिष का नोट्स था । जब उसने उसे पढ़ना शुरू क्या तो जीवन भर से उमरते सवाल एक - एक कर गायब होने लगे ।
अब ऐसा महसूस हो रहा था की जिस ज्ञान को वो पूरा जीवन हर जगह तलाश किया, वो ज्ञान तो अपने ही घर में मिला । पर साथ में उसे ये साफ़ - साफ़ ज्ञात हो रहा था की हर घटना के घटने का एक वक़्त होता है, अगर घटना वक़्त के पहले घटे तो उसका महत्त्व ही नहीं होता है । अब इत्मीनान से वह इन पुस्तिका को पढ़ना शुरू किया तो पाया कि जैसे इन सब से उसका पुराना नाता है, और ज्यों-ज्यों वो इन्हे पड़ रहा था त्यों - त्यों उसके मन के ऊपर पड़े हुए परतें हटते जा रहे थे । धीरे- धीरे ज्योतिष के ज्ञान से उसका मन प्रकाशित होने लगा, और वो अब प्रकृति और इंसान के अंदर का सम्बन्ध समझने लगा था । श्री अनिल उपाध्याय जी वही बालक है, बाबाजी के सबसे छोटे पुत्र श्री कैलाश उपाध्याय जी का बड़ा पुत्र । जिनका बचपन का नाम भोला था ।